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लखनऊ स्थित सादत अली खान और खुर्शीद जादी के भव्य मक़बरे

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  • Post last modified:September 29, 2021
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मैं हमेशा से कहता चला आ रहा हूं कि हर शहर में कुछ ऐसी अनमोल विरासतें होती हैं, जिनसे लोग अनभिज्ञ होते है। लखनऊ के कैसरबाग जैसे व्यस्त इलाके में स्थित एक इमारत है, जो सादत अली खान के मकबरे के नाम से जाना जाता है। यह भाव्यता के मामले में लखनऊ के कई इमारतों को कड़ी टक्कर देता है, लेकिन अधिकतर लोग इस इमारत से अनजान हैं। मैं आज आपका ध्यान ध्यान इस इमारत की ओर खींचने का प्रयास करूंगा और इमारत की भव्यता का बखान करूंगा। 

सादत अली खान
सादत अली खान का मकबरा

सआदत अली खान और उनकी पत्नी खुर्शीद ज़ादी का मक़बरा नवाबों के शहर लखनऊ के बहुत कम प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। लखनऊ के केंद्र कैसरबाग में स्थित, यह स्थान रानी लक्ष्मी बाई रोड पर बेगम हज़रत महल पार्क के सामने स्थित है।


थोड़ा इतिहास जानिए 

सआदत अली खान अवध के 6वें सम्राट थे। उन्होंने अवध पर 1798-1814 तक शासन किया। बेगम खुर्शीद जादी, नवाब सादत अली खान की पसंदीदा बेगम थी। खुर्शीद जादी की मृत्यु नवाब साहब के जीवनकाल के दौरान ही हो गया था। उनको यहीं दफनाया गया। कहा जाता है कि कैसरबाग पहले खास बाज़ार के नाम से जाना जाता था और इस स्थान पर राजकुमार गाज़ी उद दीन हैदर का निवास हुआ करता था। बाद में नवाब सादत अली खान की मृत्यु के बाद अपने पिता का मकबरा और खुर्शीद जादी के मकबरे का निर्माण स्वयं उनके बेटे गाजी-उद-दीन हैदर ने करवाया था।

इतिहासकारों के अनुसार लखनऊ के कैसरबाग इलाके से लेकर दिलकुशा कोठी तक की सभी इमारतों का निर्माण सादत अली के शासन काल में हुआ था। नवाब साहब स्थापत्य कला के बहुत बड़े प्रेमी थे। उनका स्थापत्य कला के प्रति प्रेम की झलक उनके द्वारा निर्मित इमारतों में बखूबी झलकती है।

मुख्य परिसर 

परिसर को अच्छी तरह से संजोकर रखा गया है, जो चारों ओर से हरियाली से भरा हुआ है। जैसे ही आप प्रवेश करते हैं, आपको अंदर दो इमारतें मिलेंगी- एक सादत अली खान की और दूसरी उसकी पत्नी खुर्शीद ज़ादी की। दोनों इमारतों के निर्माण में लखौरी ईंटों और बादामी चूने का भरपूर इस्तेमाल किया गया हैं। ऊपरी प्लास्टर बादामी चूने का कमाल है जो इमारत के किनारों को महीन धार देता हैं।

सादत अली खान का मकबरा

जब मैंने इस जगह का दौरा किया तो मैं कब्रों (मकबरा) की बारीक कलात्मकता से चकित रह गया। वास्तुकला के अद्भुत रूप और सुंदरता के कारण, यह घूमने के लिए और अपने प्रियजनों के साथ पिकनिक मनाने के लिए एक आदर्श स्थान है। सादत अली का मुख्य मकबरा, तहखाने (तहखाना) सहित तीन मंजिलों का भवन है। अंदर मकबरे में प्रवेश हेतु चार द्वार हैं, जो बाहर की तरफ खुलते हैं।

जैसे ही आप सामने से इसका दीदार करेंगे तो आपकी नजर सबसे पहले मकबरे के गुंबद पर जाएगी जो कि अत्यन्त आकर्षित दिखाई देता है। गुंबद का ऊपरी हिस्सा गुलदस्ते जैसा प्रतीत होता है। मकबरे की फर्श काले और सफेद रंग के संगमरमर से निर्मित है, जो बिल्कुल शतरंज की बिसात जैसी दिखती है। जैसे ही मैंने मुख्य हॉल में प्रवेश किया, एक बुजुर्ग मेरे पीछे आए और बोले कि क्या आप कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करना चाहेंगे। वो उस इमारत के संरक्षक थे। 

मैं इमारत के हॉल के बीचोबीच था जहां पूर्व की तरफ सादत अली खान की तीन बेटियों की कब्रे है और ठीक मेरे सामने तीन और कब्रे थी जो नवाब साहब की बेगमों की थीं।

नवाब सादत अली खान की कब्र हॉल के बीचोबीच हिस्से के नीचे तहखाने में है। तहखाने में सादात अली खान के अलावा दो अन्य कब्रे है, जो उनके भाइयों की हैं। हॉल के कोनों में घुमावदार सीढ़ियां है। वहां से एक रास्ता नीचे की ओर जाता है और दूसरा रास्ता ऊपर की ओर जहां छोटी छोटी छतरियां है। छतरियों से आपको खुर्शीद जादी के मकबरे और कैसरबाग इलाके का अच्छा नज़ारा देखने को मिल जाएगा।

खुर्शीद जादी का मकबरा

मुख्य प्रवेश द्वारा के बाईं ओर और सादत अली खान के मकबरे के पूर्व की और एक और आकृष्ट इमारत है, जो उनकी एक बेगम का है। नवाब सादात अली खान की पसंदीदा बेगम खुर्शीद ज़ादी का मकबरा भी नवाब साहब के मक़बरे जितना ही खूबसूरत है, लेकिन आकार और ऊंचाई में थोड़ा छोटा है। प्रत्येक तरफ से बगीचे और फूलों के बागानों द्वारा घिरे हुए इस इमारत की सुंदरता देखते ही बनती है। कुछ अपरिहार्य कारणों से यहां प्रवेश बंद कर दिया गया था। अतः मैं अन्दर नहीं जा पाया। देखने में इसका भी वास्तुकला नवाब साहब के मकबरे से मिलता जुलता है। इसके अंदर बेगम के साथ साथ उनकी बेटी की भी कब्र है। इसका निर्माण स्वयं सादत अली खान द्वारा शुरू करवाया गया था पर उनकी मृत्यु हो जाने के उपरांत गाज़ी उद दीन हैदर ने इसके निर्माण को पूरा करवाया।

यह भी एक तीनमंजिला इमारत है। ऊपरी मंजिल पर बालकनी है। चारो किनारे छतरीनुमा है। नंद लाल चटर्जी ने अपनी किताब ग्लोरी ऑफ उत्तर प्रदेश में लिखा है की भले ही ये दोनों इमारतें आकार में बड़ा इमामबाड़ा से छोटे है, किन्तु बेहद खूबसूरत और मनमोहक हैं। 

प्रवेश करने का समय और शुल्क

दोनों कब्रों के लिए प्रवेश शुल्क शून्य है, लेकिन यदि आप स्मारकों के बारे में जानना चाहते हैं, तो एक गाइड लें या वहीं उपस्थित संरक्षक से आग्रह करें। वो आपको केवल कुछ रुपयों में इमारत की पूरी इतिहास से रूबरू करवा देंगे। इसके अलावा, प्रवेश सूर्योदय से सूर्यास्त तक सभी के लिए खुला रहता है।

कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • यहां आसपास शाम को काफ़ी अच्छा माहौल होता है, आप बच्चों के साथ सैर पर जा सकते हैं।
  • इमारत के चारों ओर सुंदर बगीचा है।
  • पार्किंग की भी व्यवस्था नहीं है। आप सामने हज़रत महल पार्क की पार्किंग का प्रयोग कर सकते हैं।
  • अपनी चीजों का खास ख्याल रखें ।
  • यह एक विरासत है, अतः आपसे अनुरोध है कि इसको साफ़ रखने में मदद करें।
  • आसपास के बगीचों में बैठकर हसीन शाम का मज़ा उठाइए और निहारिए अपनी विरासत को।
  • आसपास के बगीचों टहलने का विकल्प है। शाम की ताज़ी हवा आपकी सारी थकान अवश्य मिटा देगी।
  • इसके विपरित कुछ कदम पर सफेद बारादरी, बटलर पार्क, लाखी, चौलाखी गेट, हज़रत महल पार्क आदि स्थित हैं, आप वहां भी जा सकते हैं।
  • यहां घूमने का कोई प्रवेश शुल्क या टिकट नहीं लगता है।

कुछ सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या इसके लिए कोई प्रवेश शुल्क है?

नहीं। यहां घूमने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।

यह लखनऊ के किस इलाके में स्थित है?

यह लखनऊ के कैसरबाग इलाके में स्थित है। निकटतम मेट्रो के डी सिंह स्टेडियम है।

सादत अली खान मकबरा किसने बनवाया?

यह इमारत सादत अली खान के पुत्र और अवध के पहले राजा गाज़ी उद दिन हैदर (1814-1827) द्वारा बनवाया गया था।

खुर्शीद जादी कौन थीं?

खुर्शीद जादी, नवाब सादत अली खान की पसंदीदा बेगम थी।

खुर्शीद जादी का मकबरा किसने बनवाया?

खुर्शीद जादी के मकबरे का निर्माण सादत अली खान द्वारा शुरू किया गया था, जिसको उनके बेटे गाज़ी उद दीन हैदर द्वारा पूरा किया गया।

कैसे पहुंचे

रेल मार्ग द्वारा

 लखनऊ के मुख्य स्टेशन लखनऊ जंक्शन, बादशाहनगर, गोमतीनगर है। सभी स्टेशन देश के सभी हिस्सों से जुड़े हुए है। आप देश के किसी भी कोने से यहां आसानी से पहुंच सकते है। स्टेशन से आप टैक्सी (ओला, उबर, रापिडो) के साथ साथ ऑटो, स्थानीय बस ले सकते है। कुछ मार्गों पर मेट्रो ट्रेन की भी सुविधा है।

हवाई मार्ग द्वारा

चौधरी चरण सिंह अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ( अमौसी एयरपोर्ट) लखनऊ का एकमात्र हवाईअड्डा है, जो देश के सभी हिस्सों से जुड़ा है। एयरपोर्ट से आप मेट्रो ट्रेन, बस, ऑटो, टैक्सी आदि की सहायता से यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।

रोड द्वारा

लखनऊ की दूरी देश की राजधानी दिल्ली से 500 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा यह शहर अन्य शहरों से भलि भांति जुड़ा हुआ है। शहर की किसी भी कोने से ऑटो, कैब, बस और मेट्रो की सहायता से यहां पहुंचा जा सकता हैं।


मेरा अनुभव

मुझे जब भी अपनी शाम यादगार बनाना होता है, तो मैं अपना 10 लीटर क्वेशुआ में आवश्यक चीज़े रखकर अपनी बाइक से चल पड़ता हूं। जितनी बार जाता हूं उतनी बार कुछ नया अनुभव करता हूं।

 इमारत के पास की हरियाली, पास की सड़क की चहल पहल, ठंडी हवा, बगीचे में टहलते हुए लोग आदि को देखकर मन प्रसन्नचित हो उठता है। 

मैं जितनी बार जाता हूं, खुद को तरोताजा और अन्दर से शांत पाता हूं। आप जब भी लखनऊ की सैर पर आए तो इस इमारत को घूमना बिल्कुल ना भूलें।

एक अपील: कृपया कूड़े को इधर-उधर न फेंके। डस्टबिन का उपयोग करें और यदि आपको डस्टबिन नहीं मिल रहा है, तो कचरे को अपने साथ ले जाएं और जहां कूड़ेदान दिखाई दे, वहां फेंक दें। आपकी छोटी सी पहल भारत को स्वच्छ और हरा-भरा बना सकता है।


Abhishek Singh

मैं अभिषेक सिंह नवाबों के शहर लखनऊ से हूं। मैं एक कंटेंट राइटर के साथ-साथ डिजिटल मार्केटर भी हूं | मुझे खाना उतना ही पसंद है जितना मुझे यात्रा करना पसंद है। वर्तमान में, मैं अपने देश, भारत की विविध संस्कृति और विरासत की खोज कर रहा हूं। अपने खाली समय में, मैं नेटफ्लिक्स देखता हूं, किताबें पढ़ता हूं, कविताएं लिखता हूं, और खाना बनाता हूँ। मैं अपने यात्रा ब्लॉग मिसफिट वांडरर्स में अपने अनुभवों और सीखों को साझा करता हूं।

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