क्या आप लखनऊ में स्थित 200 फ़ीट से ज्यादा ऊँचे क्लॉक टावर से अवगत हैं? 

बहुत लोग शायद नहीं होंगे। यूं तो उत्तर प्रदेश की राजधानी और नवाबों के शहर लखनऊ में बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें हैं कि लेकिन एक ऐसी इमारत भी है जिसे भारत के ऊंचे क्लॉक टॉवरों में शामिल होने का गौरव प्राप्त है। हम बात कर रहे हैं लखनऊ के हुसैनाबाद इलाके में स्थित हुसैनाबाद क्लॉक टावर (लखनऊ का क्लॉक टॉवर) की। तो यदि आपने लखनऊ के नवाबी रंगों में खुद को मिश्रित नहीं किया है, तो आप वास्तव में बहुत कुछ खो रहे हैं। लखनऊ का यह अद्भुत धरोहर अपनी स्थापत्य सुंदरता से आपको मंत्रमुग्ध कर देगा। 

लखनऊ का क्लॉक टॉवर
लखनऊ का क्लॉक टावर


प्राचीन इतिहास

 लखनऊ शहर अपनी पुरानी और ऐतिहासिक वास्तुकला के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है। हुसैनाबाद क्लॉक टॉवर उनमें से एक उत्कृष्ट कृति है। 

गगनचुंबी इस इमारत का निर्माण सन् 1881 में हुसैनाबाद ट्रस्ट द्वारा करवाया गया था। इसको अवध के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्ज कूपर का स्वागत करने के लिए बनवाया गया था। इस पूरे इमारत की रूपरेखा कलकत्ता के मिस्टर आर आर बायन ने रखी। अवध के तीसरे राजा मोहम्मद अली शाह के काल में इसका निर्माण प्रारंभ हुआ। सितंबर 1893 की बाढ़ में यह इमारत भी प्रभावित हुआ बाढ़ के कारण इसके नीचे का कुछ हिस्सा जलमग्न हो गया।

तबसे लेकर आज तक यह इमारत हर मौसम हर आपदा को हराकर शहर की एक पहचान बना हुआ है।

वास्तुकला एवं लदंन से घड़ी का आयात

लंदन स्थित बिग बेन की तर्ज पर इसका निर्माण करवाया गया। इसकी लंबाई 221 फ़ीट और नीचे की चौड़ाई 20 फ़ीट है और यह वर्गाकार है। यह विक्टोरियन और गोथिक शैली का अच्छा नमूना है। उस समय इसके निर्माण में लगभग 1.75 लाख की लागत आयी थी। इसमें स्थित घड़ियां लंदन के लडगेट से मंगाई गई थी जिसको उस समय की जानी मानी कंपनी जे डब्लयू बेंसन वॉचेज ने बनाया था।

अलग कोण से झलक

 इस क्लॉक टॉवर में लगी सुइयां बंदूक धातु से निर्मित है। इसका पेंडुलम चौदह फ़ीट लंबा और डेढ़ इंच मोटा है। आसपास फूलों के पंखुड़ियों के आकार पर बेल्स लगी है जो हर घंटे बजती हैं। 

जब रुक गई घड़ी

सन् 1984 में घड़ी ने काम करना बंद कर दिया। तबसे लेकर सन् 2010 तक घड़ी बंद की ही अवस्था में रही।

स्थानीय प्रशासन ने इसकी जगह इलेक्ट्रिक घड़ी लगाने के प्रस्ताव रखा। तभी लखनऊ के दो नागरिक, परितोष चौहान और अखिलेश अग्रवाल ने हुसैनाबाद ट्रस्ट से अनुमति प्राप्त की और क्लॉक टॉवर की घड़ी की मरम्मत का कार्य शुरू किया।

किसी कोने से दृश्य

उनका मानना था कि क्लॉक टॉवर के पुराने गौरव और भव्यता को कायम रखना जरूरी है। 2 वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद वो दोनों घड़ी को पुनः जीवित करने में सफल रहे। इस घंटघर ने कई विरासतें और पीढ़ियां देखीं है।

टिकट और भ्रमण का समय

यहां घूमने का कोई शुल्क या टिकट नहीं लगता है | आप यहां 24 घंटे घूम सकते हैं | पर मेरी सलाह में यदि आप शाम के समय घूमेंगे तो एक अलग अनुभव प्राप्त होगा |

रूमी गेट से क्लॉक टावर

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु 

  • यहां आसपास शाम को काफ़ी अच्छा माहौल होता है, आप बच्चों के साथ सैर पर जा सकते हैं।
  • स्ट्रीट फूड की बहुत सारी दुकानें आदि स्थित है, जहां आप स्थानीय जायका का मज़ा उठा सकते है।
  • पीछे की तरफ पार्किंग की भी व्यवस्था है।
  • अपनी चीजों का खास ख्याल रखें ।
  • यह एक विरासत है, अतः आपसे अनुरोध है कि इसको साफ़ रखने में मदद करें।
  • बच्चे ऊंट सफारी और खिलौनों का लुत्फ़ उठा सकते हैं।
  • पास में लगी हुई बेंचो पर बैठकर, हसीन शाम का मज़ा उठाइए और निहारिए अपनी विरासत को।
  • आसपास टहलने का विकल्प है। शाम की ताज़ी हवा आपकी सारी थकान अवश्य मिटा देगी।
  • इसके विपरित कुछ कदम पर सतखंडा ( सात मंजिला ऐतिहासिक इमारत) और पिक्चर गैलरी है, आप वहां भी का सकते हैं।
  • शाम के समय यहां डूबते हुए सूरज को देखना एक यादगार पल होगा। डूबते हुए सूरज की लालिमा, आपका मन मोह लेगी।
  • 500 मीटर की दूरी पर कुडिया घाट है, जहां आप बोटिंग का मज़ा भी उठा सकते हैं।
  • यहां घूमने का कोई प्रवेश शुल्क या टिकट नहीं लगता है।

कैसे पहुंचे

रेल मार्ग द्वारा

 लखनऊ के मुख्य स्टेशन लखनऊ जंक्शन, बादशाहनगर, गोमतीनगर है। सभी स्टेशन देश के सभी हिस्सों से जुड़े हुए है। आप देश के किसी भी कोने से यहां आसानी से पहुंच सकते है। स्टेशन से आप टैक्सी (ओला, उबर, रापिडो) के साथ साथ ऑटो, स्थानीय बस ले सकते है। कुछ मार्गों पर मेट्रो ट्रेन की भी सुविधा है।

हवाई मार्ग द्वारा

चौधरी चरण सिंह अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ( अमौसी एयरपोर्ट) लखनऊ का एकमात्र हवाईअड्डा है, जो देश के सभी हिस्सों से जुड़ा है। एयरपोर्ट से आप मेट्रो ट्रेन, बस, ऑटो, टैक्सी आदि की सहायता से यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।

रोड द्वारा

लखनऊ की दूरी देश की राजधानी दिल्ली से 500 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा यह शहर अन्य शहरों से भलि भांति जुड़ा हुआ है।

कुछ सामान्य रूप से पूंछे जाने वाले सवाल

यहां का प्रवेश शुल्क कितना है?

क्लॉक टॉवर घूमने का कोई टिकट नहीं लगता है। आप 24 घंटे यहां घूम सकते हैं।

लखनऊ क्लॉक टॉवर के पास होटल और रेस्तरां है?

हां। क्लॉक टॉवर के 5 किमी के इलाके में बहुत से होटल और रेस्तरां है।

आसपास और क्या घूम सकते हैं?

लखनऊ का क्लॉक टॉवर से एक किलोमीटर की दूरी में रूमी दरवाजा, बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, भूल भुलैया आदि स्थित है।


मेरा अनुभव 

मुझे जब भी अपनी शाम यादगार बनाना होता है, तो मैं अपना 10 लीटर क्वेशुआ में आवश्यक चीज़े रखकर अपनी बाइक से चल पड़ता हूं। जितनी बार जाता हूं उतनी बार कुछ नया अनुभव करता हूं।

ढलता हुए सूरज की लालिमा, आस पास लगे स्ट्रीट फूड के ठेले, चहल पहल, ठंडी हवा, ऊंट की सवारी करते हुए बच्चे, चाट का मजा उठाते हुए लोग आदि को देखकर मन प्रसन्नचित हो उठता है। 

मैं जितनी बार जाता हूं, खुद को तरोताजा और अन्दर से शांत पाता हूं। टॉवर के नजदीक बेंच की सतह पर बैठकर, हाथ में चाय की प्याली लिए, क्लॉक टॉवर की चोटी पर मंडराते हुए परिंदों को देखना अपने आप के चैन देता है।

पास लगे नारियल के पेड़ और छोटा सा मानवरहित तालाब इसकी सुंदरता में वृद्धि करते है।

सतखंडा और पिक्चर गैलरी का दृश्य

एक अपील: कृपया कूड़े को इधर-उधर न फेंके। डस्टबिन का उपयोग करें और यदि आपको डस्टबिन नहीं मिल रहा है, तो कचरे को अपने साथ ले जाएं और जहां कूड़ेदान दिखाई दे, वहां फेंक दें। आपकी छोटी सी पहल भारत को स्वच्छ और हरा-भरा बना सकता है।


Share this information with your friends:
Default image
Abhishek Singh

मैं अभिषेक सिंह नवाबों के शहर लखनऊ से हूं। मैं एक कंटेंट राइटर के साथ-साथ डिजिटल मार्केटर भी हूं | मुझे खाना उतना ही पसंद है जितना मुझे यात्रा करना पसंद है। वर्तमान में, मैं अपने देश, भारत की विविध संस्कृति और विरासत की खोज कर रहा हूं। अपने खाली समय में, मैं नेटफ्लिक्स देखता हूं, किताबें पढ़ता हूं, कविताएं लिखता हूं, और खाना बनाता हूँ। मैं अपने यात्रा ब्लॉग मिसफिट वांडरर्स में अपने अनुभवों और सीखों को साझा करता हूं।

Articles: 36

2 Comments

अपनी टिप्पणी या सुझाव दें