लखनऊ का कम बहुपरिचित शाहनजफ़ इमामबाड़ा

अधिकांश लखनऊवासी केवल दो प्रमुख इमामबाड़ों के बारे में जानते हैं, अर्थात्, बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा। तथ्य की बात यह है कि लखनऊ में कई और इमामबाड़े हैं। और उनमें से एक उल्लेखनीय शाहनजफ़ इमामबाड़ा है।

कहने को तो यह शहर के सबसे व्यस्ततम इलाके में स्थित है, लेकिन खुद लखनऊ की जनता इससे अनजान है। आज मैं आपको इस इमामबाड़े की हर चीज से रूबरू करवाऊंगा।

सामने से शाहनजफ इमामबाड़ा


 स्वयं घोषित अवध के पहले राजा 

आप थोड़ा तो अचंभित अवश्य हुए होंगे की मैंने अवध का राजा बोला। हम सबको यहीं पता है कि लखनऊ की गद्दी पर जो बैठता था और शासन करता था उसे नवाब बोला जाता था और वो मुगलों के अधीन था। अवध के 6 वें नवाब, सआदत अली खान तक, नवाब सिर्फ अपने क्षेत्र और भूमि के शासक थे, लेकिन शासक नहीं थे, और मुगलों के नियंत्रण में थे।

लेकिन शाहनजफ़ इमामबाड़ा बनाने वाले सातवें नवाब, गाजी-उद-दीन हैदर ने इस रिवाज को नकार दिया और खुद को अवध का पहला राजा घोषित किया। तो मूल रूप से इसका मतलब है, गाजी-उद-दीन हैदर 7 वें नवाब और अवध के पहले राजा थे।

क्या होता है इमामबाड़ा?

इमामबाड़ा – का सामान्य अर्थ है वह पवित्र स्थान या भवन जो विशेष रूप से हज़रत अली (हज़रत मुहम्मद के दामाद) तथा उनके बेटों, हसन और हुसेन, के स्मारक के रूप में बनाया जाता है। इमामबाड़ों में शिया संप्रदाय के मुसलमानों की मजलिसें और अन्य धार्मिक समारोह होते हैं।

‘इमाम’ मुसलमानों के धार्मिक नेता को कहते हैं। मुस्लिम जनसाधारण का पथप्रदर्शन करना, मस्जिद में सामूहिक नमाज़ का अग्रणी होना, खुत्बा पढ़ना, धार्मिक नियमों के सिद्धांतों की अस्पष्ट समस्याओं को सुलझाना, व्यवस्था देना इत्यादि इमाम के कर्त्तव्य हैं।

इस्लाम के दो मुख्य संप्रदायों में से ‘शिया’ के सम्मानित इमाम हज़रत मुहम्मद के बाद इमाम उनके दोनों बेटे हुए। वे विरोधी दल से अपने जन्मसिद्ध अधिकारों के लिए युद्ध करते हुए बलिदान हुए थे।

उनकी याद में शिया सम्प्रदाय के लोग हर वर्ष मुहर्रम के महीने में उनके घोड़े ‘दुलदुल’ (एक विशेष घोड़े) की पूजा करके उन नेताओं को याद करके बड़ा शोक मनाते हैं। उनके प्रतीकस्वरूप ताजिए बनाकर उनका जुलूस निकालते हैं। ये ताजिए या तो कर्बला में दफ़ना दिए जाते हैं या इमामबाड़ों में रख दिए जाते हैं। इसी अवसर पर इमामबाड़ों में उन शहीदों की स्मृति में मातम मनाया जाता हैं।

हज़रत अली को श्रद्धांजलि

 शाहनज़फ इमामबाड़ा अवध के पहले राजा गाजी-उद-दीन हैदर ने इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद के दामाद हजरत अली की याद में बनवाया था।शाहनजफ इमामबाड़ा इराक के नजफ में हजरत अली की कब्र की प्रतिकृति है। यह भवन लखनऊ में राणा प्रताप मार्ग पर गोमती नदी के पास बसा है। आज का सबसे उल्लेखनीय लैंडमार्क सहारागंज मॉल ( हजरतगंज) शाहनजफ इमामबाड़ा के सामने है। इसके एक तरफ राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान केन्द्र है।

इमामबाड़ा में प्रवेश सभी धर्मों के लोगों के लिए मुफ्त प्रवेश है जबकि इमामबाड़ा के किनारे मस्जिद केवल मुसलमानों के लिए सुलभ है।

शाहनजफ़ इमामबाड़ा
अंदर का रास्ता

शाहनजफ़ इमामबाड़ा की बनावट 

मुख्य दरवाज़े से इमामबाड़े के दरवाज़े तक के रास्ते सफेद संगमरमर से बना है। प्रमुख रूप से इसकी बनावट में लाखौरी ईंटों और बादामी चूने का प्रयोग किया गया है।

प्रवेश द्वार

जैसे ही हम इमारत के अंदर प्रवेश कर रहे थे, बरामदे की आकृतियां और बनावट हमारी आँखों को खींचता जा रहा था। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हमारा शहर लखनऊ इतिहास और वास्तुकला के ऐसे महान वास्तुकला से भरा है।

शाहनजफ़ इमामबाड़ा के अंदर प्रवेश करते हुए हमें कुछ रास्ते और दरवाजे और बरामदे का एक लंबा रास्ता मिला। इमामबाड़ा के केंद्र वाले गुंबद के नीचे एक बड़ा हॉल था, जहाँ गाजी-उद-दीन हैदर के अवशेष को उनकी इच्छानुसार रखा गया है। हॉल अत्यन्त सुंदर था और शीशों की कलात्मकता से सजाया गया था।

अंदर की सजावट

गाज़ी उद दीन हैदर के अलावा यह उनकी तीन रानियां, सरफराज महल, मुबारक महल और मुमताज महल की बी कब्रें हैं।

कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • यहां आसपास शाम को काफ़ी अच्छा माहौल होता है, आप  सैर पर जा सकते हैं।
  • इमारत के चारों ओर सुंदर बगीचा है।
  • पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था है।
  • अपनी चीजों का खास ख्याल रखें ।
  • शाहनजफ़ इमामबाड़ा एक विरासत है, अतः आपसे अनुरोध है कि इसको साफ़ रखने में मदद करें।
  • आसपास के बगीचों टहलने का विकल्प है। शाम की ताज़ी हवा आपकी सारी थकान अवश्य मिटा देगी।
  • इसके विपरित कुछ कदम पर हजरतगंज, मोटी महल, राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान केन्द्र, सिकंदरबाग आदि स्थित हैं, आप वहां भी जा सकते हैं।
  • शाहनजफ़ इमामबाड़ा घूमने का कोई प्रवेश शुल्क या टिकट नहीं लगता है।

शाहनजफ़ इमामबाड़ा कैसे पहुंचे

रेल मार्ग द्वारा

 लखनऊ के मुख्य स्टेशन लखनऊ जंक्शन, बादशाहनगर, गोमतीनगर है। सभी स्टेशन देश के सभी हिस्सों से जुड़े हुए है। आप देश के किसी भी कोने से यहां आसानी से पहुंच सकते है। स्टेशन से आप टैक्सी (ओला, उबर, रापिडो) के साथ साथ ऑटो, स्थानीय बस ले सकते है। कुछ मार्गों पर मेट्रो ट्रेन की भी सुविधा है।

हवाई मार्ग द्वारा

चौधरी चरण सिंह अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ( अमौसी एयरपोर्ट) लखनऊ का एकमात्र हवाईअड्डा है, जो देश के सभी हिस्सों से जुड़ा है। एयरपोर्ट से आप मेट्रो ट्रेन, बस, ऑटो, टैक्सी आदि की सहायता से यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।

रोड द्वारा

लखनऊ की दूरी देश की राजधानी दिल्ली से 500 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा यह शहर अन्य शहरों से भलि भांति जुड़ा हुआ है। शहर की किसी भी कोने से ऑटो, कैब, बस और मेट्रो की सहायता से यहां पहुंचा जा सकता हैं।


हमारा अनुभव

 जैसे ही हमने मुख्य हॉल में प्रवेश किया, हमे एक व्यक्ति मिला जो वहां का संरक्षक और मार्गदर्शक था। उसने हमें राजा के बारे में समझाया, कुछ पैसों के बदले में हॉल के अंदर उनके दो वज़ीर और सभी पवित्र चीजों को चित्रित किया। उसने हर एक चीज़ का वर्णन बड़ी ही शालीनता और कुशलता से किया। हमारे मन में उठ रहे सवालों का भी जवाब बड़ी ही सरलता से दिया।

अंत में, मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि मेरे शहर लखनऊ को और करीब से जानना एक अद्भुत अनुभव था। इसके अलावा इस जगह के शांत वातावरण ने मेरे सिर के अंदर की सारी थकान को छू मंतर कर दिया।

एक अपील: कृपया कूड़े को इधर-उधर न फेंके। डस्टबिन का उपयोग करें और यदि आपको डस्टबिन नहीं मिल रहा है, तो कचरे को अपने साथ ले जाएं और जहां कूड़ेदान दिखाई दे, वहां फेंक दें। आपकी छोटी सी पहल भारत को स्वच्छ और हरा-भरा बना सकता है।


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Abhishek Singh

मैं अभिषेक सिंह नवाबों के शहर लखनऊ से हूं। मैं एक कंटेंट राइटर के साथ-साथ डिजिटल मार्केटर भी हूं | मुझे खाना उतना ही पसंद है जितना मुझे यात्रा करना पसंद है। वर्तमान में, मैं अपने देश, भारत की विविध संस्कृति और विरासत की खोज कर रहा हूं। अपने खाली समय में, मैं नेटफ्लिक्स देखता हूं, किताबें पढ़ता हूं, कविताएं लिखता हूं, और खाना बनाता हूँ। मैं अपने यात्रा ब्लॉग मिसफिट वांडरर्स में अपने अनुभवों और सीखों को साझा करता हूं।

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