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लखनऊ का छत्तर मंजिल और फरहत बख्श कोठी

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  • Post last modified:October 10, 2021
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कभी अपने शहर में मुसाफ़िर बन के देखिए,

यकीन मानिए आपको अपना शहर नया सा लगेगा।

बात तो बिल्कुल सही है, जब आप अपने शहर से मुसाफ़िर जैसा रूबरू होंगे, आपको खुद का ही शहर अनजाना और नया सा लगेगा। नवाबों और कबाबों का शहर लखनऊ नवाबी शानोशौकत और कबाब के लिए देश भर में भली भांति परिचित है। पर अक्सर पर्यटक यहां के प्रमुख पर्यटक स्थलों को देखने में इतना मशगूल हो जाते है कि कुछ छुपे हुए रत्नों से मुखातिब ही नहीं हो पाते। 

लखनऊ का निवासी और मुसाफ़िर होने के कारण मैंने इस शहर के सभी इमारतों को बड़े ही करीब से घूमा है और आज मैं आपको एक ऐसे ही इमारत के बारे में बताऊंगा जो कभी नवाबों की शान हुआ करती थी। ऐसा ही ऐतिहासिक धरोहर है, छत्तर मंजिल और फरहत बख्श कोठी। तो चलिए मेरे साथ एक अनजान जगह को घूमने।



फरहत बख्श कोठी का इतिहास 

फरहत बख्श कोठी का मूल नाम “मार्टिन विला” था। इसका निर्माण मेजर जनरल क्लाउड मार्टिन ने सन् 1781 में करवाया था। यह इंडो – फ्रेंच वास्तुकला का अद्भुत नमूना पेश करता है। कहा जाता है कि यह उनका निवास स्थान हुआ करता था। यह दोमंजिला इमारत थी, जिसका निचला हिस्सा गोमती नदी को छूता था, जिसकी वज़ह से बरसात के मौसम में नीचे का हिस्सा पानी में डूब जाया करता था। इसके अंदर हवा का संचालन और अंदर के माहौल को ठंडा रखने के लिए गोमती किनारे बनवाया गया था। ऊपरी मंजिल में एक बड़ा हॉल था, जहां 4000 किताबें अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा की रखी गई थी। साथ ही 500 हस्तलिखित प्रतिलिपियाँ भी संकलित थीं। क्लाउड मार्टिन को पढ़ने  बहुत शौक था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनको ला मार्टीनियर में दफनाया जाए। और हुआ भी ऐसा ही।

मान्यता है कि मई 1781 में ही जब यह इमारत पूर्ण होने वाली थी, तभी बनारस के राजा छेत सिंह ने इसपर आक्रमण कर दिया और किसी तरह इसकी हिफाज़त हो सकी। युद्ध के उपरांत क्लाउड मार्टिन ने इसके तीनों तरफ बड़ी खाई बनवाई और चौथा भाग जो गोमती से जुड़ा था, उसपर पुल बनवाया। यही से अंदर प्रवेश का द्वार बनवाया। अपनी अंतिम सांस तक क्लाउड मार्टिन इसी इमारत में रहे।

नवाब द्वारा खरीदा जाना

क्लाउड मार्टिन सम्पूर्ण जीवन अविवाहित रहे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात इस विला का कोई भी वारिस नहीं था। अतः इस इमारत को बेचने के लिए बोली लगाने का आयोजन किया गया, जहां नवाब सादत अली खान को बोली में मात देते हुए एक स्पेनिश व्यक्ति, जोसेफ क्वेरोस ने इस इमारत को अपने नाम कर लिया। उन्होंने इसको 40 हजार रूपए में खरीदा। 

कुछ समय बाद नवाब सादत अली खान की तबीयत थोड़ी बिगड़ी और हवा पानी बदलने के लिए वो यहां रहने के लिए आए। यहां की आबोहवा और खुशनुमा माहौल ने जल्दी ही नवाब साहब को ठीक कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने जोसेफ क्वेरोस पर थोड़ा दबाव डाला और इस इमारत को उनसे खरीद कर अपने नाम कर लिया। ये सादत अली खान ही थे जिन्होंने इस इमारत का नाम बदलकर “फरहत बख्श कोठी” ( बेस्टोअर ऑफ हैप्पीनेस) रखा। नवाब सादत अली खान से लेकर वाजिद अली शाह से पहले तक के सभी नवाब और अवध के राजाओं का यह निवास स्थान हुआ करता था। वाजिद अली शाह ने अपने निवास स्थान के रूप में कैसरबाग महल को चुना। 

संशोधन का स्वरूप बना छत्तर मंजिल 

फरहत बख्श कोठी में परिवर्तन किए गए और इमारत का विस्तार किया गया। इसका विस्तार स्वरूप ही छत्तर मंजिल बना। सादत अली खान (1798-1814) ने ही इसके विस्तार स्वरूप का निर्माण अपनी मां “छत्तर कुंवर” के नाम पर करवाना आरंभ करवाया, परन्तु उनकी मृत्यु के उपरांत इसके निर्माण का जिम्मा उनके पुत्र और अवध के पहले राजा गाज़ी उद दीन हैदर (1814-1827) ने लिया और इमारत के निर्माण को अंतिम रूप दिया। बाद में नसीर उद दीन हैदर (1827-1837) ने इसको और भी अलंकृत किया। इसके किनारे मूर्तियों और फूलों की क्यारियां उसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती थी जिसे गुलिस्तान-ए-इरम (गार्डेन ऑफ पैराडाइज) के नाम से जाना जाता था।

आकर्षक स्थापत्य कला

इंडो फ्रेंच स्थापत्य शैली में निर्मित यह महल इतना भव्य है कि पहली नज़र में ही आप मोहित हो जाएंगे। इसके ऊपरी भाग में निर्मित मुख्य गुंबद ‘छतरी‘ के आकार का है, इसी के चलते इसका नाम “छत्तर मंजिल” पड़ा। यह महल अपने शानदार दीवानखाना, तहखानों, सुरंगों और सुंदर मेहराबों के लिए मशहूर है। इसके तह़खानों को गोमती नदी के पानी में बनाया गया था। बताया जाता है कि भूतलों की दीवारों से गोमती का पानी टकराता था, जिससे उन भूतलों के भवनों में भी बराबर ठंडक बनी रहती थी। जिसके कारण यह भंयकर गर्मियों के दौरान भी ठंडाते थे। ऐसा भी कहा जाता है कि सिंघासनरोहण के समय जब नवाब ने छत्र धारण किया तभी उन्होंने इस इमारत के ऊपर छत्र लगवाया था।

आलिशान छतर मंजिल
आलिशान छतर मंजिल

यह पैलेस पहले अवध के नवाब और उनकी बेगमों का निवास स्‍थान हुआ करता था और बाद में 1857 की क्रांति, भारत की आजादी के प्रथम युद्ध में स्‍वतंत्रता सेनानियों की बैठक का एक केन्‍द्र बिन्‍दु भी बन गया था और इसका प्रयोग स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों द्वारा किया जाने लगा।

इसी कारण 1857 की क्रांति का साक्षी बनना पड़ा और भारी क्षति को सहना पड़ा। 1859 में अंग्रेजो द्वारा इसपर अधिकार कर लिया गया और इसको एक क्लब में परिवर्तित कर दिया गया।

वर्तमान स्थिति 

आज़ादी के बाद सन् 1950 में फरहत बख्श कोठी और छत्तर मंजिल को ” केंद्रीय औषधि अनुसंधान केन्द्र ” (CDRI) को सौंप दिया गया जिसमें संस्थान का कार्यालय संचालित है। अभी जल्दी ही इस संस्थान के कार्यालय को नवनिर्मित भवन में स्थानांतरित कर दिया गया है। वर्ष 2017 में आर्किटेक्चर कॉलेज की डीन वंदना सहगल के नेतृत्व में एक टीम ने इसकी खोदाई कराकर नीचे दबी एक पूरी मंजिल से रूबरू कराया। जिसके उपरांत प्रशाशन हरकत में आया।

हाल में ही भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसको अपने नियंत्रण में लिया है और इसके जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ किया है। राजकीय निर्माण निगम की ओर से करीब आठ करोड़ के बजट से फरहत बख्श कोठी का पूरा बाहरी हिस्सा संवार लिया गया है। अब अंदर का हिस्सा भी संवारा जा रहा है। दोनों इमारतों को संवारने का कार्य प्रगति पर है। जल्द ही यह पर्यटकों के भी फ़िर से खोला जाएगा। 

कुछ ध्यान देने योग्य बातें

  • यह लखनऊ के कैसरबाग इलाके में स्थित है, यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • फिलहाल इसको घूमने के लिए कोई भी टिकट नहीं लगता है। 
  • फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करने की अनुमति है।
  • सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक जाने का आदर्श समय है।
  • चूंकि संवारने का कार्य हो रहा है, वहां सभी बताए हुए निर्देशों का पालन करें।
  • इस इमारत को अब अवध विरासत और परंपराओं पर केन्द्रित एक संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाना प्रस्तावित है।
दोनों इमारतों के मनमोहक गुम्बद
दोनों इमारतों के मनमोहक गुम्बद

कैसे पहुंचे

रेल मार्ग द्वारा

 लखनऊ के मुख्य स्टेशन लखनऊ जंक्शन, बादशाहनगर, गोमतीनगर है। सभी स्टेशन देश के सभी हिस्सों से जुड़े हुए है। आप देश के किसी भी कोने से यहां आसानी से पहुंच सकते है। स्टेशन से आप टैक्सी (ओला, उबर, रापिडो) के साथ साथ ऑटो, स्थानीय बस ले सकते है। कुछ मार्गों पर मेट्रो ट्रेन की भी सुविधा है।

हवाई मार्ग द्वारा

चौधरी चरण सिंह अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ( अमौसी एयरपोर्ट) लखनऊ का एकमात्र हवाईअड्डा है, जो देश के सभी हिस्सों से जुड़ा है। एयरपोर्ट से आप मेट्रो ट्रेन, बस, ऑटो, टैक्सी आदि की सहायता से यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।

रोड द्वारा

लखनऊ की दूरी देश की राजधानी दिल्ली से 500 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा यह शहर अन्य शहरों से भलि भांति जुड़ा हुआ है। शहर की किसी भी कोने से ऑटो, कैब, बस और मेट्रो की सहायता से यहां पहुंचा जा सकता हैं।

मेरा अनुभव 

सबसे पहले तो मैं इसके नाम से भ्रमित हुआ। किसी कहना है कि छत्तर मंजिल और फरहत बख्श कोठी अलग अलग है, तो किसी का मानना है कि दोनों एक ही है। इस उथल पुथल ने मेरे मस्तिष्क को घूमा दिया। तब मैंने बड़ी ही बारीकी से इसका अध्ययन किया फ़िर सभी चीज़े साफ तौर पर दिखने लगी। 

आपको एक और बात बताना चाहूंगा कि मान्यता है कि एक और इमारत हूबहू इसके जैसा ही नवाब ने छत्तर मंजिल के पास बनवाई जिसको छोटा छत्तर मंजिल के नाम से जाना जाता था, जो कि 1857 की क्रांति में थोड़ा प्रभावित हुई। स्वतंत्रता के पश्चात इसमें राज्य सरकार का दफ्तर हुआ करता था। वो भी 1960 के दशक में अचानक ढह गया था।

जब मैं यहां स्कूटर से पहुंचा तो इसको संवारा जा रहा था, आप तस्वीरों में देख सकते है। मेरे अंदर बड़ी जिज्ञासा थी कि खोदे गए सुरंग को देखूं। इसलिए मैं सीधा इसके पीछे वाले हिस्से की ओर गया और स्तब्ध रह गया। एक बड़ी सुरंग मैं साफ देख सकता था। वहां एक व्यक्ति परिचय हुआ जो सारे कार्य का निरीक्षण कर रहे थे, उनके मुताबिक इसको जल्दी ही आम पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। 


एक अपील: कृपया कूड़े को इधर-उधर न फेंके। डस्टबिन का उपयोग करें और यदि आपको डस्टबिन नहीं मिल रहा है, तो कचरे को अपने साथ ले जाएं और जहां कूड़ेदान दिखाई दे, वहां फेंक दें। आपकी छोटी सी पहल भारत को स्वच्छ और हरा-भरा बना सकता है।


Abhishek Singh

मैं अभिषेक सिंह नवाबों के शहर लखनऊ से हूं। मैं एक यात्रा लेखक और शायर हूं। विज्ञान वर्ग में स्नातक होने के साथ-साथ डिजिटल मार्केटर भी हूं | स्वाद के मामले में मेरा कोई जवाब नहीं। खाने के साथ मुझको घूमने का बहुत शौक है।अपने हिसाब से ज़िन्दगी जीने की हर कीमत चुकाने को हमेशा तैयार रहता हूं। मेरे हिसाब से अगर आप अपने सपनो को दबा देते है तो आप वास्तव में एक निर्जीव के सिवा कुछ नहीं है | मैं बिना किसी की परवाह किये अपने सपनो को पूरा करने की राह पर चल पड़ा हूं।

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